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अपने भगवान हम खुद हैं...

मेरा सबसे बड़ा धर्म कर्म सब इंसानियत हैं। कुछ दिनों पहले एक मंदिर के पुजारी से बहस हो गयी। मसला कोई बड़ा नहीं था पुजारी जी ने मसला बड़ा कर दिया था। परिक्रमा एक मंत्र के साथ करनी थी। मैंने भी की, पंडित जी ने पूछा कि आपने कौन सा मंत्र पढ़ा। मैंने उन्हें बता दिया। पंडित जी ने कहा कितना पढ़े हुए हो। मैंने कहा पोस्ट ग्रेजुएशन। पंडित जी कॉलर ऊँचा करके कहने लगे, आप पढ़ लिखकर भी एक मंत्र याद न कर सकी।

मैंने मन ही मन सोचा कि मंत्र तो ठीक ही बोला था मुझे उनकी बात कुछ समझ नहीं आयी। उन्होंने विस्तार से बताया कि मंत्र में मैंने कॄष्ण की जगह राम का उच्चारण किया। बस इतनी बात पर कहने लगे कि तभी हिन्दू धर्म खतरे में है। ऐसा लगा मानो ये बात कोई पंडित नहीं नेता कह रहा हो। आज के युवाओं को इन सबसे कुछ लेना देना ही नहीं। मैंने कहा भगवान को हम किसी भी रूप में याद कर सकते हैं। बिना मंदिर आये भी हम भगवान को एक दिन में कई बार याद करते हैं। भगवान एक ही हैं बस नाम कई हैं। इतना कहते ही पंडित जी का दिमाग गर्म हो गया। कहते कि ऐसा नहीं होता।
मैं उनसे पूरी तरह असहमत थी। पंडित जी हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं तो क्या आप 33 करोड़ देवी देवता की अलग अलग पूजा करते हैं ? नहीं ना। अब आप भगवान को अलग अलग जातियों की तरह बांट रहे हैं। यहां लोग नास्तिक भी हैं और आस्तिक भी हैं। भगवान को किसी भी रूप में याद करने के लिए हम स्वत्रंत हैं। हम खुद को संतुष्ट करते हैं कि मुसीबत में हमारी मदद भगवान ने की। लेकिन असल में हमने खुद ही अपनी मुसीबत और परेशानियों से खुद को बाहर निकाला होता हैं। मैं नास्तिक बिल्कुल नहीं हूं लेकिन ये बात भी सच है कि हमारी मदद मुसीबत में कोई नहीं करता हैं लेकिन नई राह के लिए रास्ते जरूर मिल जाते हैं।
थोड़ी देर बाद मुद्दे की बात पर आये और पूछने लगे कि आप कौन हैं? मैंने मुस्कुराते हुए कहा - इंसान। लेकिन मैं समझ गयी थी कि वो क्या पूछना चाह रहे थे। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले उनके द्वारा ही एक सर्वे किया गया था। जिसमें अधिकतर लोगों का जवाब था उनकी जाति। अगर आप किसी भी शख्श से यही प्रश्न करेंगे तो वो सबसे पहले अपनी जाति बतायेगा। बस उनकी इसी बात से सहमत थीं। उसके बाद मामला थोड़ा ठंडा हुआ तो मंदिर के एक इवेन्ट के बारे में बताने लगे।
कोमल

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